( लेखक सोनू शर्मा नोयडा )
खाकी, खाकी, खाकी, ये वही खाकी जिसके सान्निध्य मे आम जनता अपने आप को सुरक्षित महसूस करती है जब रात के अंधेरे में आप सुनसान रास्ते से गुजरते हैं और आपको डर लगने लगता है आप अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हो तब आपको अचानक सामने कोई पुलिसकर्मी दिख जाये तो आपका खुशी का ठिकाना नहीं रहता है और आप अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगते हैं पुलिस की जितनी बुरी छवि दिखाई देती है हकीकत मे पुलिस उतनी बुरी नही है पुलिस वाले जिस मुजरिम को अपनी जान जोखिम में डाल कर पकडते हैं उन्हें वकील मात्र पाँच मिनट में जमानत दिलवा देते हैं बीस साल के स्थायी वारंटी को वकील एक दिन से ज्यादा जेल में नहीं रहने देते हैं यही पुलिस वाले दिन हो या रात अपनी ड्यूटी इमानदारी से निभाते हैं कोई भी त्यौहार परिवार के साथ मनाने का सौभाग्य तो इनको मिल ही नहीं पाता है इनकी सैलेरी इतनी कम है कि इनसे ज्यादा तो एक ठेला वाला भी कमा लेता है ड्यूटी भी चौबीस घंटे की और सरकारी आवास नाम मात्र के वो भी इतने छोटे की बता भी नहीं सकते हैं अगर घर पर कोई मेहमान आ जाये तो सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि कहाँ और कैसे सोयेगें और ये आवास भी सभी जगह उपलब्ध नही है और आवास उपलब्ध न होने की स्थिति मे उसके बदले मिलने वाला आवासीय भत्ता भी नाम मात्र का मिलता है कहने को तो एक साल में साठ छुट्टियाँ हैं लेकिन छः छुट्टियां भी मुश्किल नही मिल पाती है असलियत मे हर चौराहे और तिराहों पर पुलिस तैनात मिलती है इसलिए उसका छोटा-मोटा भ्रष्टाचार भी सबकी नज़र में
रहता है वास्तव में भ्रष्टाचार देखना हो तो
चकबंदी कार्यालय, अस्पताल, विकास भवन, कलेक्ट्रेट और बैंकों में जाईये जहाँ पर लेखपाल अच्छे-भले खेत की जगह बंजर दे देता है बंजर भूमि की जगह उपजाऊ जमीन दे देता है डाक्टर हल्की चोट पर ही धारा 307 की रिपोर्ट बनाकर दे देता है क्लर्क दस हजार रुपये लेकर पच्चीस-तीस हजार का इंदिरा आवास देता है बैंक मैनेजर एक लाख रुपये का ऋण दस हजार रुपये लेकर मंजूर करता है बैंक प्रबन्धक दस-पंद्रह हजार लेकर मंजूर करता है क्या आम जनता इन जगहों पर भ्रष्टाचार नजर नहीं आता है उनको सिर्फ पुलिस विभाग मे ही भ्रष्टाचार नजर आता है अगर पुलिस ना हो तो सभी जगह हाहाकार मच जायेगा अगर आप कुछ गलत करने का सोच रहे हैं तो सबसे पहले आपके मन मे पुलिस का ही विचार आता है यदि पुलिस पर से सिर्फ राजनैतिक दबाव खत्म हो जाये तो पुलिस आज भी सौ प्रतिशत ईमानदार हो जायेगी जो आप लोगों की सुरक्षा के लिए अपने सारे सपनों और अरमानों को कुर्बान कर देती है धूप हो या छाँव, रात हो या दिन, बारिश, आँधी या फिर हो तूफान बस खाकी आम जनता की सुरक्षा और सहयोग के लिए खड़ी रहती है क्या कभी आपने सोचा है कि उनके पीछे उनका एक परिवार है जिस परिवार माता-पिता, बहन भाई, बीबी बच्चे है उनका भी अपने परिवार के प्रति कुछ दायित्व है लेकिन वो अपने परिवार के प्रति दायित्वों क्या कभी पूरा कर पाये हैं कभी, नही क्यों नही पूरा कर पाये हैं ये सोचा है आपने कभी भला आप क्यों सोचने लगे क्योंकि आपमे से कुछ लोग कहेंगे कि क्या उनको सरकार तनख्वाह नही देती है जब पुलिस की नौकरी इतनी परेशानी की है तो करते क्यो है और फिर सबसे अच्छी कमाई तो उनकी नंबर दो की है ये तो सब वैसे ही कहते हैं पुलिस की नौकरी बहुत मजे की है तो मै आपकी इन सारी बातों का बिन्दूवार जवाब दूगाँ तो सबसे पहले बात करते हैं तनख्वाह की क्या आपको ये मालूम है कि अगर सरकार उनको तनख्वाह दे रही है तो कितने समय की डूयूटी के लिए नही पता तो मै बता रहा हूँ चौबीस घंटे की डूयूटी के लिए क्या आप मे है इतनी शक्ति कि आप चौबीस घंटे की डूयूटी कर सकें दूसरा आप कह रहे थे कि क्या पुलिस की नौकरी करनी जरूरी है तो ये बात तो वही लोग कह रहें होगें जिन्होंने कभी भी कमा कर के नही खाया होगा जो अपने माँ बाप की कमाई पर ऐश कर रहे होंगे क्योंकि जिसके पीछे परिवार है तो उसे तो नौकरी करनी बहुत जरूरी है चाहे परेशानी भरी हो या नहीं, लेकिन इसका मतलब ये तो है नही कि वो पुलिस की नौकरी कर रहे हैं तो उनकी कोई परेशानी या समस्या नही है या हम उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करते रहे ऐसा सिर्फ स्वार्थी लोग ही सोचते हैं उन से पूछिये जिनके बेटे और भाई पुलिस मे नौकरी कर रहे हैं वो बतायेंगे कि उनका दर्द क्या है और आप कह रहे थे इनकी नंबर दो की कमाई बहुत अच्छी है तो क्या आप लोगों ने कभी ये सोचा है कि उस नंबर दो कमाई के सबसे बड़े गुनाहगार तो आप लोग ही हैं क्योंकि जब आप का बेटा या भाई जब किसी केस में फँसता तो आप जैसे ही लोग पुलिस को घूस देने की पेशकश करते हो जब पुलिस कहती नही हमे पैसे नही चाहिये तो आप लोग और बड़ी सिफारिश और पैसे लेकर फिर पुलिस पर दबाव बनाते हो क्योंकि उस वक्त कैसे भी तुम्हारा बेटा या भाई छूटना चाहिए और जब आप अपने इस मिशन मे कामयाब हो जाते हैं तो फिर कहते हैं कि पुलिस तो रिश्वतखोर है लेकिन अपने गिरेबान मे झाँककर आज तक नहीं देखा होगा उल्टे उन पर आरोप लगाने मे जरा भी शर्म नही आती है कि आप लोगों के लिए वो अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर देते हैं जब आप होली दीवाली ईद जैसे त्यौहारों पर घर नही जाओगे तो आपको कैसा लगेगा, जब रक्षाबंधन के दिन आपकी बहन राखी लिये तुम्हारी राह देख रही होगी और आप जब उससे कहोगे मै नही आ पाऊँगा तो आपको कैसा लगेगा जब आपके भाई या बहन की शादी हो रही हो और आप छुट्टी न मिलने के कारण नही शामिल हो पा रहे तो आपको कैसा लगेगा बुरा लगेगा ना आपको तो मै ये ही आपको बता रहा हूँ कि इस दर्द को आज हमारी खाकी झेल रही है ना समय पर छुट्टियां मिल पाती हैं ना सप्ताह मे आराम के लिए एक भी दिन, जिसकी वजह से उन लोगों को मानसिक रूप से से परेशानी होने लगती है इन को बिना घर जाये कई कई महीने हो जाते हैं इतनी परेशानी होने के बाद सरकारी सुविधा भी न के बराबर है आखिर ये करें तो क्या करें कौन सुनेगा इनकी और किसे सुनाये आखिर ये भी हमारी तरह इंसान ही है इनका भी परिवार के साथ कुछ समय बिताने का मन करता है मै आपको एक बार की बात बताता हूँ मुझे एक व्यक्ति मिला जिसने मुझे बताया कि आगे पुलिस चैकिंग कर रही है मेरी मोटरसाइकिल को पैसेऊलेकर छोड़ा है इनको हर समय रिश्वत चाहिए तो मैने उससे पूछा कि किस बात के पैसे लिये हैं तुझसे तो वो बोला लाईसेंस और हेल्मेट नही था मैने पूछा क्या पुलिस ने तुझ से पैसे माँगे थे वो बोला नही वो तो मेरा चालान काट रहे थे तब मैने उनको पैसे देकर रूकवा लिया तो मैने कहा कि इसमें तेरी ही गलती थी तुझे कागज सारे अपने मे साथ रखने चाहिए थे और फिर तुने अपनी मर्जी से ही पुलिस को पैसे दिये हैं इसमे पुलिस का क्या दोष है वो तो अपना कार्य सही ढंग से कर रही है आप जैसे लोग ही पुलिस को सही कार्य नही करने दे रहे हैं खाकी के इस दर्द को ना तो वरिष्ठ अधिकारी समझ पा रहे हैं ना ही आम जनता, जिसका परिणाम ये हो रहा है कि अधिकतर पुलिसकर्मी मानसिक रूप से परेशान रहने लगे हैं इसका ताजा उदाहरण अभी कुछ समय पूर्व बुलन्दशहर पुलिस लाईन हुआ हादसा तो आपको याद होगा वह भी छुट्टी न मिलने और सीनियरों द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था जिसका परिणाम क्या निकला ये आप सभी को पता है यह समस्या पुलिस विभाग मे छोटे स्तर पर ही नहीं बड़े स्तर पर भी है बस फर्क सिर्फ इतना है कि पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारियों की समस्या कुछ ज्यादा ही संख्या मे है अब जाकर मुख्यमंत्री महोदय ने दस दिन पर एक अवकाश की घोषणा की है लेकिन छुट्टियों और उनको सुविधा देने के नाम पर कुछ भी नही किया है अगर वरिष्ठ अधिकारी चाहे तो इनकी समस्याओं को जानकर शासन को अवगत कराते हुए समस्या के निदान का प्रयास तो कर सकते हैं लेकिन नही करेगें क्योंकि फिर उनकी हुकूमत कुछ कम हो जायेगी हमारा वरिष्ठ अधिकारियों से अनुरोध है कि अगर किसी विभाग मे छोटे कर्मचारी सही है तो वरिष्ठ अधिकारी भी सही है अगर छोटे कर्मचारी सही नही है तो आप भी अपने को सही मत समझना क्योंकि छोटे कर्मचारी ही आपके विभाग की जान होते हैं वैसे मै जो इस लेख को लिख रहा हूँ तो मेरे मन भी एक विचार आ रहा है कि कुछ लोग मेरे बारे मे क्या सोचेंगे कोई मुझे पुलिस का दल्ला कहेगा, कोई पुलिस चमचा कहेगा और पता नहीं मेरा क्या क्या नामकरण किया जायेगा लेकिन मुझ इस बात की कोई परवाह नही है क्योंकि जो इन बातों की परवाह करेगा वो पत्रकार नही कहलाता है पत्रकार का कार्य है बिना डरे सच्चाई जनता के समक्ष लाये चाहे वो किसी सरकारी विभाग की हो या आम जनता की हो
खाकी, खाकी, खाकी, ये वही खाकी जिसके सान्निध्य मे आम जनता अपने आप को सुरक्षित महसूस करती है जब रात के अंधेरे में आप सुनसान रास्ते से गुजरते हैं और आपको डर लगने लगता है आप अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हो तब आपको अचानक सामने कोई पुलिसकर्मी दिख जाये तो आपका खुशी का ठिकाना नहीं रहता है और आप अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगते हैं पुलिस की जितनी बुरी छवि दिखाई देती है हकीकत मे पुलिस उतनी बुरी नही है पुलिस वाले जिस मुजरिम को अपनी जान जोखिम में डाल कर पकडते हैं उन्हें वकील मात्र पाँच मिनट में जमानत दिलवा देते हैं बीस साल के स्थायी वारंटी को वकील एक दिन से ज्यादा जेल में नहीं रहने देते हैं यही पुलिस वाले दिन हो या रात अपनी ड्यूटी इमानदारी से निभाते हैं कोई भी त्यौहार परिवार के साथ मनाने का सौभाग्य तो इनको मिल ही नहीं पाता है इनकी सैलेरी इतनी कम है कि इनसे ज्यादा तो एक ठेला वाला भी कमा लेता है ड्यूटी भी चौबीस घंटे की और सरकारी आवास नाम मात्र के वो भी इतने छोटे की बता भी नहीं सकते हैं अगर घर पर कोई मेहमान आ जाये तो सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि कहाँ और कैसे सोयेगें और ये आवास भी सभी जगह उपलब्ध नही है और आवास उपलब्ध न होने की स्थिति मे उसके बदले मिलने वाला आवासीय भत्ता भी नाम मात्र का मिलता है कहने को तो एक साल में साठ छुट्टियाँ हैं लेकिन छः छुट्टियां भी मुश्किल नही मिल पाती है असलियत मे हर चौराहे और तिराहों पर पुलिस तैनात मिलती है इसलिए उसका छोटा-मोटा भ्रष्टाचार भी सबकी नज़र में
रहता है वास्तव में भ्रष्टाचार देखना हो तो
चकबंदी कार्यालय, अस्पताल, विकास भवन, कलेक्ट्रेट और बैंकों में जाईये जहाँ पर लेखपाल अच्छे-भले खेत की जगह बंजर दे देता है बंजर भूमि की जगह उपजाऊ जमीन दे देता है डाक्टर हल्की चोट पर ही धारा 307 की रिपोर्ट बनाकर दे देता है क्लर्क दस हजार रुपये लेकर पच्चीस-तीस हजार का इंदिरा आवास देता है बैंक मैनेजर एक लाख रुपये का ऋण दस हजार रुपये लेकर मंजूर करता है बैंक प्रबन्धक दस-पंद्रह हजार लेकर मंजूर करता है क्या आम जनता इन जगहों पर भ्रष्टाचार नजर नहीं आता है उनको सिर्फ पुलिस विभाग मे ही भ्रष्टाचार नजर आता है अगर पुलिस ना हो तो सभी जगह हाहाकार मच जायेगा अगर आप कुछ गलत करने का सोच रहे हैं तो सबसे पहले आपके मन मे पुलिस का ही विचार आता है यदि पुलिस पर से सिर्फ राजनैतिक दबाव खत्म हो जाये तो पुलिस आज भी सौ प्रतिशत ईमानदार हो जायेगी जो आप लोगों की सुरक्षा के लिए अपने सारे सपनों और अरमानों को कुर्बान कर देती है धूप हो या छाँव, रात हो या दिन, बारिश, आँधी या फिर हो तूफान बस खाकी आम जनता की सुरक्षा और सहयोग के लिए खड़ी रहती है क्या कभी आपने सोचा है कि उनके पीछे उनका एक परिवार है जिस परिवार माता-पिता, बहन भाई, बीबी बच्चे है उनका भी अपने परिवार के प्रति कुछ दायित्व है लेकिन वो अपने परिवार के प्रति दायित्वों क्या कभी पूरा कर पाये हैं कभी, नही क्यों नही पूरा कर पाये हैं ये सोचा है आपने कभी भला आप क्यों सोचने लगे क्योंकि आपमे से कुछ लोग कहेंगे कि क्या उनको सरकार तनख्वाह नही देती है जब पुलिस की नौकरी इतनी परेशानी की है तो करते क्यो है और फिर सबसे अच्छी कमाई तो उनकी नंबर दो की है ये तो सब वैसे ही कहते हैं पुलिस की नौकरी बहुत मजे की है तो मै आपकी इन सारी बातों का बिन्दूवार जवाब दूगाँ तो सबसे पहले बात करते हैं तनख्वाह की क्या आपको ये मालूम है कि अगर सरकार उनको तनख्वाह दे रही है तो कितने समय की डूयूटी के लिए नही पता तो मै बता रहा हूँ चौबीस घंटे की डूयूटी के लिए क्या आप मे है इतनी शक्ति कि आप चौबीस घंटे की डूयूटी कर सकें दूसरा आप कह रहे थे कि क्या पुलिस की नौकरी करनी जरूरी है तो ये बात तो वही लोग कह रहें होगें जिन्होंने कभी भी कमा कर के नही खाया होगा जो अपने माँ बाप की कमाई पर ऐश कर रहे होंगे क्योंकि जिसके पीछे परिवार है तो उसे तो नौकरी करनी बहुत जरूरी है चाहे परेशानी भरी हो या नहीं, लेकिन इसका मतलब ये तो है नही कि वो पुलिस की नौकरी कर रहे हैं तो उनकी कोई परेशानी या समस्या नही है या हम उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करते रहे ऐसा सिर्फ स्वार्थी लोग ही सोचते हैं उन से पूछिये जिनके बेटे और भाई पुलिस मे नौकरी कर रहे हैं वो बतायेंगे कि उनका दर्द क्या है और आप कह रहे थे इनकी नंबर दो की कमाई बहुत अच्छी है तो क्या आप लोगों ने कभी ये सोचा है कि उस नंबर दो कमाई के सबसे बड़े गुनाहगार तो आप लोग ही हैं क्योंकि जब आप का बेटा या भाई जब किसी केस में फँसता तो आप जैसे ही लोग पुलिस को घूस देने की पेशकश करते हो जब पुलिस कहती नही हमे पैसे नही चाहिये तो आप लोग और बड़ी सिफारिश और पैसे लेकर फिर पुलिस पर दबाव बनाते हो क्योंकि उस वक्त कैसे भी तुम्हारा बेटा या भाई छूटना चाहिए और जब आप अपने इस मिशन मे कामयाब हो जाते हैं तो फिर कहते हैं कि पुलिस तो रिश्वतखोर है लेकिन अपने गिरेबान मे झाँककर आज तक नहीं देखा होगा उल्टे उन पर आरोप लगाने मे जरा भी शर्म नही आती है कि आप लोगों के लिए वो अपनी सारी खुशियां कुर्बान कर देते हैं जब आप होली दीवाली ईद जैसे त्यौहारों पर घर नही जाओगे तो आपको कैसा लगेगा, जब रक्षाबंधन के दिन आपकी बहन राखी लिये तुम्हारी राह देख रही होगी और आप जब उससे कहोगे मै नही आ पाऊँगा तो आपको कैसा लगेगा जब आपके भाई या बहन की शादी हो रही हो और आप छुट्टी न मिलने के कारण नही शामिल हो पा रहे तो आपको कैसा लगेगा बुरा लगेगा ना आपको तो मै ये ही आपको बता रहा हूँ कि इस दर्द को आज हमारी खाकी झेल रही है ना समय पर छुट्टियां मिल पाती हैं ना सप्ताह मे आराम के लिए एक भी दिन, जिसकी वजह से उन लोगों को मानसिक रूप से से परेशानी होने लगती है इन को बिना घर जाये कई कई महीने हो जाते हैं इतनी परेशानी होने के बाद सरकारी सुविधा भी न के बराबर है आखिर ये करें तो क्या करें कौन सुनेगा इनकी और किसे सुनाये आखिर ये भी हमारी तरह इंसान ही है इनका भी परिवार के साथ कुछ समय बिताने का मन करता है मै आपको एक बार की बात बताता हूँ मुझे एक व्यक्ति मिला जिसने मुझे बताया कि आगे पुलिस चैकिंग कर रही है मेरी मोटरसाइकिल को पैसेऊलेकर छोड़ा है इनको हर समय रिश्वत चाहिए तो मैने उससे पूछा कि किस बात के पैसे लिये हैं तुझसे तो वो बोला लाईसेंस और हेल्मेट नही था मैने पूछा क्या पुलिस ने तुझ से पैसे माँगे थे वो बोला नही वो तो मेरा चालान काट रहे थे तब मैने उनको पैसे देकर रूकवा लिया तो मैने कहा कि इसमें तेरी ही गलती थी तुझे कागज सारे अपने मे साथ रखने चाहिए थे और फिर तुने अपनी मर्जी से ही पुलिस को पैसे दिये हैं इसमे पुलिस का क्या दोष है वो तो अपना कार्य सही ढंग से कर रही है आप जैसे लोग ही पुलिस को सही कार्य नही करने दे रहे हैं खाकी के इस दर्द को ना तो वरिष्ठ अधिकारी समझ पा रहे हैं ना ही आम जनता, जिसका परिणाम ये हो रहा है कि अधिकतर पुलिसकर्मी मानसिक रूप से परेशान रहने लगे हैं इसका ताजा उदाहरण अभी कुछ समय पूर्व बुलन्दशहर पुलिस लाईन हुआ हादसा तो आपको याद होगा वह भी छुट्टी न मिलने और सीनियरों द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था जिसका परिणाम क्या निकला ये आप सभी को पता है यह समस्या पुलिस विभाग मे छोटे स्तर पर ही नहीं बड़े स्तर पर भी है बस फर्क सिर्फ इतना है कि पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारियों की समस्या कुछ ज्यादा ही संख्या मे है अब जाकर मुख्यमंत्री महोदय ने दस दिन पर एक अवकाश की घोषणा की है लेकिन छुट्टियों और उनको सुविधा देने के नाम पर कुछ भी नही किया है अगर वरिष्ठ अधिकारी चाहे तो इनकी समस्याओं को जानकर शासन को अवगत कराते हुए समस्या के निदान का प्रयास तो कर सकते हैं लेकिन नही करेगें क्योंकि फिर उनकी हुकूमत कुछ कम हो जायेगी हमारा वरिष्ठ अधिकारियों से अनुरोध है कि अगर किसी विभाग मे छोटे कर्मचारी सही है तो वरिष्ठ अधिकारी भी सही है अगर छोटे कर्मचारी सही नही है तो आप भी अपने को सही मत समझना क्योंकि छोटे कर्मचारी ही आपके विभाग की जान होते हैं वैसे मै जो इस लेख को लिख रहा हूँ तो मेरे मन भी एक विचार आ रहा है कि कुछ लोग मेरे बारे मे क्या सोचेंगे कोई मुझे पुलिस का दल्ला कहेगा, कोई पुलिस चमचा कहेगा और पता नहीं मेरा क्या क्या नामकरण किया जायेगा लेकिन मुझ इस बात की कोई परवाह नही है क्योंकि जो इन बातों की परवाह करेगा वो पत्रकार नही कहलाता है पत्रकार का कार्य है बिना डरे सच्चाई जनता के समक्ष लाये चाहे वो किसी सरकारी विभाग की हो या आम जनता की हो
## अधिकारी पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिये इस पर ध्यान अवश्य दें ##
आजकल एक दर्द और भी है जो खाकी को छुट्टियों के अलावा सबसे ज्यादा मानसिक परेशानी दे रहा है वो ये है कि कुछ राजनीतिक या संगठनों के नेता आजकल अपने थाने के सबसे तेज तर्रार, कामयाब, ईमानदार पुलिसकर्मियों को निशाना बनाते हैं या तो ये पुलिसकर्मी उनकी सभी बाते को माने और इनकी चापलूसी करते रहे तो ठीक है नही तो ये कहीं पर इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ पचास सौ लोगों को इकट्ठा करके धरने पर बैठ जाते हैं कि ये पुलिस वाला ठीक नहीं है ये रिश्वतखोर, जूओं के अड्डे चलाता है , शराब बिकवाता है, वाहनों से अवैध वसूली करता है इसको हटाओ इससे जनता बहुत परेशान हैं और अधिकारी इन नेताओं के दबाव आकर ऐसे पुलिसकर्मियों को हटा देते हैं जिसका प्रभाव ये पड़ता है कि वो पुलिसकर्मी जहाँ पर भी जायेगा ऐसे नेताओं की या तो चापलूसी करेगा या मानसिक रूप से परेशान रहेगा कि मै किस विभाग मे नौकरी कर रहा हूँ जहाँ के अधिकारी अपने कर्मचारियों पर भरोसा करने की बजाय छुटपुट नेताओं की बात पर भरोसा करते हैं और हटाये गये पुलिसकर्मी की जगह जो भी दूसरा पुलिसकर्मी जब वहाँ जायेगा और उसे जब यह पता चलेगा कि उस नेताजी ने उस पुलिस वाले को हटवा दिया था तो वो भी नेताजी की जी हजूरी करने लगेगा और इस तरह पुलिस विभाग मे हर समय अपने विभाग के कार्यो के लिए तत्पर रहने वाले पुलिसकर्मियों की कमी महसूस करेगा क्योंकि वो अगर सही कार्य करेगा तो उसे तो राजनेताओं और सामाजिक संगठनों के गुस्से का शिकार होना पड़ेगा मै ये नही कह रहा कि सभी पुलिस कर्मी दूध के धूले है सभी ईमानदार हैं लेकिन जब ऐसे नेताओं द्वारा किसी भी पुलिसकर्मियों हटाने की बात जब भी आये तो अधिकारियों का फर्ज है कि पहले जाँच करे और अगर वो दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्यवाही करे और निर्दोष पाये जाने पर आरोप लगाने वाले नेताजी के खिलाफ कार्यवाही करे इससे पुलिसकर्मियों के गिरते जा रहे मनोबल मे वृद्धि होगी और पुलिसकर्मी अपने कार्य को और ईमानदारी व मेहनत से अंजाम देगें अगर हमारे इस लेख से किसी को भी किसी तरह की आपत्ति /परेशानी है तो हम उनसे क्षमा चाहते हैं
नोट ::ये सभी विचार लेखक के अपने है अन्य किसी का इन विचारों से सहमत होना जरूरी नही है लेख पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करें इस लेख के साथ छेड़छाड़ या काॅपी पेस्ट करना कानूनी रूप से अपराध है

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