दरअसल, बीजेपी इसी ऊहापोह से बचना चाहती थी इसलिए उसने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि बहस अफजल गुरु और देशविरोधी नारों के इर्द गिर्द हो, लेकिन संसद के दोनों सदनों में जैसे बहस आगे बढ़ी, बहस का रुख दरअसल दलितों की ओर मुड़ गया। संसद में स्मृति के जोरदार अंदाज ने बीजेपी में आत्मविश्वास जरूर भरा, लेकिन जानकारों की नजर में वो तात्कालिक ही था, दूरगामी असर बीजेपी के दलित वोटों का भारी नुकसान कर सकता है।
अब जानने की कोशिश करते हैं ऐसा हुआ कैसे। दरअसल रोहित वेमुला पर बहस की शुरुआत ही मायवती ने राज्यसभा में स्मृति से यह पूछकर की थी कि जो आत्महत्या की जांच के लिए कमिटी बनी है उसमें किसी दलित को लिया जाए। तीन दिन तक चली संसद की खींचतान का जब समापन हुआ तब तक भी सरकार की ओर से ये साफ नहीं किया गया कि इस जांच समिति में दलित को शामिल करने को लेकर उनकी क्या राय है।
बहस के दौरान स्मृति का मायावती को निशाना बनाकर अपनी बात कहना भी इस मुद्दे पर बीजेपी के दलितों के खिलाफ खड़े होना जैसा नजर आया। दरअसल मायावती राजनीति में दलित तबके का नेतृत्व करती हैं। उनपर स्मृति का पहले दिन हावी होना ट्विटर-फेसबुक और मीडिया में स्मृति का वाहवाही दिला गया, लेकिन जानकार मानते हैं कि दलितों में जो मैसेज गया कि बीजेपी की ओर से दलित पार्टी को निशाना बनाया गया है। स्मृति ने बहस जिस आक्रामक अंदाज में शुरू की, उसे शुक्रवार को उसी आक्रामक अंदाज में मायावती ने ये पूछकर समाप्त किया कि आपने कहा था कि अगर मैं आपके जवाब से संतुष्ट न होऊं तो आप मेरे चरणों में अपना सिर काट कर रख देंगी, अब मैं आपसे कहना चाहती हूं कि मैं आपके जवाब से संतुष्ट नहीं हूं, अपना वादा पूरा करेंगी क्या।
विवाद यहां तक होता तो थम जाता कि बीजेपी की ओर से दूसरी एक और बड़ी गलती हुई कि स्मृति ने राज्यसभा में बहस के दौरान जेएनयू में 2013 में हुए महिषासुर पर आयोजन का हवाला देकर उसका मजमून पढ़ दिया। बेशक इसके पीछे बीजेपी की कोशिश ये थी कि जेएनयू पर एकजुट विपक्ष को बिखेर दिया जाए। स्मृति ने तंज भरे लहजे में तब कहा था कि आप जो उन्हें दलित, गरीब, अल्पसंख्यक तबके का बता रहे हैं उनका सच क्या है, मैं आपको बताती हूं। उन्होंने वो मजमून पढ़ा भी, लेकिन इससे विपक्ष को दलित मुद्दे पर लामबंद होने का सुनहरा मौका मिल गया।
अगले दिन महिषासुर मुद्दे पर भी पूरे मीडिया में जोरदार चर्चा चलती रही। लेकिन यहां भी कई सांसदों ने तर्क दिया पूरे समाज का तानाबाना अलग है, हिंदू समाज में मौजूद अलग-अलग समाजों की मान्यताएं भी अलग-अलग हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि संथाल जैसी कुछ जातियां महिषाषुर को मानती हैं।
बीजेपी की स्थिति तब और खराब हो गई जब मीडिया में ये सामने आया कि बीजेपी के ही अपने सांसद उदित राज 2013 के उस महिषासुर पर कार्यक्रम में शामिल हुए थे। जब उदित से इस पर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिबद्धता और सामाजिक प्रतिबद्धता दो अलग-अलग बातें हैं। साफ है कि बीजेपी के अंदर ही जो दलित तबका है वो बीजेपी के इस कदम से सहमत नहीं दिखता।
ऐसा नहीं है कि बीजेपी को दलित वोट के महत्व का अंदाजा नहीं है। बीजेपी ने अपना दलित आधार और मजबूत करने के लिए ही पीएम मोदी को आगे किया है। गौर करिए, मोदी हाल ही में वाराणसी में रविदास जयंती पर एक रविदास मंदिर गए थे। बीजेपी को अच्छी तरह से अंदाजा है कि दलित वोट बैंक ही उन्हें यूपी में जीत दिला पाएगा। वह केवल सवर्ण वोट के जरिए कम से कम यूपी फतह नहीं कर सकती। अल्पसंख्यक तो पहले ही उनसे छिटके हुए हैं और स्मृति-भागवत के बयानों ने उनकी स्थिति खराब ही की है।
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